क्रिया योग : आत्मा से परमात्मा की ओर एक सेतु
भूमिका
मानव जीवन का उद्देश्य केवल भौतिक उपलब्धियों तक सीमित नहीं है। धन, पद और मान-सम्मान क्षणिक हैं, किंतु आत्मा की शांति और ईश्वर का साक्षात्कार शाश्वत है। इसी शाश्वत सत्य की ओर ले जाने वाला मार्ग है – क्रिया योग। यह केवल एक साधना नहीं, बल्कि एक संपूर्ण जीवन दर्शन है, जो साधक को भीतर से रूपांतरित करता है।
योग का शाब्दिक अर्थ है – जुड़ना या मिलन। योग का अंतिम लक्ष्य है आत्मा और परमात्मा का मिलन। जहाँ सामान्य योग साधनाएँ शरीर और मन को शुद्ध करती हैं, वहीं क्रिया योग साधक को सीधा आत्मज्ञान और परमशांति के अनुभव की ओर ले जाता है।
क्रिया योग का अर्थ और दर्शन
क्रिया योग का मूल अर्थ है – क्रिया अर्थात कार्य या साधना, और योग अर्थात परमात्मा से मिलन। यह साधना श्वास और प्राण के माध्यम से साधक को आंतरिक गहराई में ले जाती है।
परमहंस योगानंदजी ने इसे “आध्यात्मिक विज्ञान” कहा है। उनका कहना था कि यह विधि गणित की भांति निश्चित रूप से कार्य करती है – “यदि कोई इसे निष्ठा से करे, तो परिणाम निश्चित हैं।”
क्रिया योग साधक को यह अनुभव कराता है कि वह केवल एक नश्वर शरीर या मन नहीं, बल्कि एक शाश्वत, आनंदमय आत्मा है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
क्रिया योग का इतिहास अत्यंत प्राचीन है।
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भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कहा – “गुप्ततम योग” यही क्रिया योग है।
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पतंजलि योगसूत्र में भी इसकी झलक मिलती है, जहाँ ऋषि पतंजलि ने प्राणायाम और ध्यान को आत्मज्ञान की कुंजी बताया।
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कहा जाता है कि यह योग ईसा मसीह और उनके शिष्यों को भी ज्ञात था।
लेकिन कलयुग की अंधकारमय अवधि में यह विधि लुप्त हो गई।
1861 में महावतार बाबाजी, जो अमर योगी माने जाते हैं, ने इस विधि को पुनः प्रकट किया। उन्होंने इसे अपने शिष्य लाहिड़ी महाशय को हिमालय में दिया। लाहिड़ी महाशय ने गृहस्थ जीवन में रहते हुए इसे हजारों लोगों को सिखाया।
इसके बाद यह परंपरा श्री युक्तेश्वर गिरी और फिर उनके शिष्य परमहंस योगानंद तक पहुँची। योगानंदजी ने 1920 में अमेरिका जाकर इसे विश्वभर में फैलाया। उन्होंने योगदा सत्संग सोसाइटी (YSS) भारत में और Self-Realization Fellowship (SRF) अमेरिका में स्थापित की।
क्रिया योग का विज्ञान
क्रिया योग का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है – प्राण ऊर्जा (Life Force) का नियंत्रण।
साधारण जीवन में मनुष्य की श्वास 15–18 बार प्रति मिनट चलती है। हर सांस के साथ हमारी जीवन ऊर्जा बाहर की ओर प्रवाहित होती है। यही ऊर्जा धीरे-धीरे शरीर को क्षीण करती है और जीवन को सीमित करती है।
क्रिया योग साधना के द्वारा साधक श्वास को लंबा और शांत बनाता है। धीरे-धीरे हृदय और फेफड़ों की गतिविधि धीमी हो जाती है। इसके परिणामस्वरूप –
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मन स्वाभाविक रूप से शांत हो जाता है।
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साधक का ध्यान भीतर केंद्रित होने लगता है।
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चेतना ऊँचे स्तरों पर उठने लगती है।
योगानंदजी ने कहा – “एक क्रिया, जो आधे मिनट में पूरी होती है, वह साधारण आध्यात्मिक प्रगति के एक वर्ष के बराबर होती है।”
क्रिया योग और अन्य योग मार्गों का संबंध
भारतीय दर्शन में योग के तीन प्रमुख मार्ग बताए गए हैं –
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कर्म योग – निःस्वार्थ सेवा का मार्ग।
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ज्ञान योग – विवेक और ज्ञान का मार्ग।
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भक्ति योग – प्रेम और भक्ति का मार्ग।
इसके अलावा, पतंजलि ने अष्टांग योग का वर्णन किया है – यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि।
क्रिया योग इन सभी का सार है। इसमें कर्म (नियमित साधना), ज्ञान (आत्मविवेक), भक्ति (गुरु और ईश्वर के प्रति समर्पण) और अष्टांग योग के सभी अंग जीवंत हो उठते हैं। यही कारण है कि इसे राजयोग की उच्चतर विधि कहा गया है।
गुरु-शिष्य परंपरा और दीक्षा
क्रिया योग केवल पुस्तकों से नहीं सीखा जा सकता। इसे दीक्षा (Initiation) के माध्यम से गुरु से प्राप्त करना आवश्यक है।
जैसे कोई कठिन पर्वत चढ़ने के लिए मार्गदर्शक की आवश्यकता होती है, वैसे ही आत्मिक मार्ग पर भी गुरु की आवश्यकता होती है। गुरु न केवल साधना की तकनीक सिखाते हैं, बल्कि साधक को मार्ग में आने वाली बाधाओं से पार कराते हैं।
क्रिया योग की परंपरा के महान गुरु –
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महावतार बाबाजी
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लाहिड़ी महाशय
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श्री युक्तेश्वर गिरी
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परमहंस योगानंद
अनन्दा तथा योगदा सत्संग सोसाइटी जैसे संस्थानों के माध्यम से आज भी यह परंपरा जीवित है।
क्रिया योग की साधना और अनुभव
क्रिया योग में साधक विशेष प्रकार की श्वास-प्रणाली का अभ्यास करता है। इस प्रक्रिया में प्राण ऊर्जा को रीढ़ की हड्डी के केंद्र (sushumna nadi) में ऊपर-नीचे प्रवाहित किया जाता है।
धीरे-धीरे साधक अनुभव करता है कि –
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बाहरी इंद्रियों का आकर्षण घट रहा है।
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मन भीतर की ओर खिंच रहा है।
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ध्यान गहरा और स्थिर हो रहा है।
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आत्मा के भीतर शांति और आनंद का प्रकाश जग रहा है।
यह अनुभव सामान्य मानसिक सुख से कहीं गहरा और स्थायी होता है।
आधुनिक समय में क्रिया योग का महत्व
आज की तेज़-तर्रार और तनावपूर्ण जीवनशैली में मनुष्य बाहरी उपलब्धियों के पीछे भागते-भागते थक गया है। चिंता, तनाव और असंतोष हर जगह दिखाई देते हैं।
ऐसे समय में क्रिया योग मनुष्य को –
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मानसिक शांति,
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आत्मिक बल,
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जीवन का सही उद्देश्य,
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और ईश्वर का सीधा अनुभव प्रदान करता है।
यह केवल साधुओं या संन्यासियों के लिए नहीं है, बल्कि गृहस्थ जीवन में भी अपनाया जा सकता है।
निष्कर्ष
क्रिया योग कोई साधारण ध्यान विधि नहीं है, बल्कि एक संपूर्ण आध्यात्मिक विज्ञान है। यह आत्मा को परमात्मा से जोड़ने का सीधा मार्ग है। यह न केवल साधक के भीतर परिवर्तन लाता है, बल्कि समाज और विश्व में भी शांति और सौहार्द्र स्थापित करने की क्षमता रखता है।
परमहंस योगानंदजी ने भविष्यवाणी की थी – “एक दिन क्रिया योग पूरे विश्व में फैलेगा और मानवता को एक परिवार की तरह जोड़ देगा।”
इसलिए क्रिया योग केवल एक साधना नहीं, बल्कि मानवता की आध्यात्मिक यात्रा का सार्वभौमिक मार्ग है।